मूल नक्षत्र क्या है, प्रभाव और उपाय

27 नक्षत्रों में मूल 19वें स्थान पर आता है. यह धनु राशि के पहले 13 डिग्री 20 मिनट में पड़ता है, और इसका स्वामी केतु है.

मूल नक्षत्र को लेकर परिवारों में जितनी चिंता रहती है, उतनी शायद ही किसी और नक्षत्र को लेकर होती हो. इस लेख में हम यह देखेंगे कि परंपरा असल में क्या कहती है, और किस बात को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा दिया गया है.


मूल नक्षत्र, बुनियादी जानकारी

विवरणजानकारी
क्रम19वां नक्षत्र
स्वामी ग्रहकेतु
देवतानिऋति
राशिधनु (0 से 13 डिग्री 20 मिनट)
प्रतीकबंधी हुई जड़ें
स्वभावतीक्ष्ण

"मूल" शब्द का अर्थ ही जड़ है. प्रतीक भी जड़ों का गुच्छा है. इसका भाव यह है कि यह नक्षत्र चीज़ों की तह तक जाता है, ऊपरी सतह पर नहीं रुकता.


मूल नक्षत्र वालों का स्वभाव

केतु का असर इस नक्षत्र को बाकी सबसे अलग बनाता है.

  • गहराई में जाने वाले: किसी बात को सतह पर मान लेना इन्हें ठीक नहीं लगता, जड़ तक पहुंचना चाहते हैं
  • खोजी मन: दर्शन, अध्यात्म, शोध और रहस्यों में स्वाभाविक रुचि रहती है
  • साफ़ बोलने वाले: बात घुमाकर कहना नहीं आता, इससे कभी कभी लोग नाराज़ हो जाते हैं
  • उतार चढ़ाव: जीवन में बड़े बदलाव आते हैं, पर हर बदलाव के बाद स्थिति पहले से बेहतर होती है
  • अच्छे क्षेत्र: शोध, चिकित्सा, अध्यात्म, ज्योतिष, जांच से जुड़े काम, तकनीक

अब असली सवाल, क्या मूल नक्षत्र अशुभ है

यहां साफ़ बात कहना ज़रूरी है.

परंपरा में मूल नक्षत्र के सभी 4 चरण एक जैसे नहीं माने जाते. ज़्यादातर शास्त्रीय ग्रंथ केवल पहले चरण को संवेदनशील बताते हैं, और वह भी खास तौर पर पिता के लिए. बाकी तीन चरणों को सामान्य माना गया है.

इसके बावजूद आम धारणा यह बन गई है कि मूल नक्षत्र में जन्म लेना ही अपने आप में अशुभ है. यह बात शास्त्र से ज़्यादा सुनी सुनाई परंपरा से आई है.

ध्यान रखने वाली बात: भारत में हर साल लाखों बच्चे मूल नक्षत्र में जन्म लेते हैं. 27 नक्षत्रों में से एक होने का मतलब है कि लगभग हर 27वां व्यक्ति इसी में पैदा होता है. किसी एक नक्षत्र से पूरा जीवन तय नहीं होता. कुंडली में लग्न, ग्रहों की स्थिति, दशा और योग सब मिलकर तस्वीर बनाते हैं.

गंड मूल क्या होता है

मूल अकेला नहीं है. जिन नक्षत्रों में राशि बदलती है, उनकी संधि को गंड मूल कहते हैं. ये छह नक्षत्र हैं:

नक्षत्रस्वामीकहां पड़ता है
अश्विनीकेतुमेष की शुरुआत
आश्लेषाबुधकर्क का अंत
मघाकेतुसिंह की शुरुआत
ज्येष्ठाबुधवृश्चिक का अंत
मूलकेतुधनु की शुरुआत
रेवतीबुधमीन का अंत

ध्यान दीजिए, ये सब केतु या बुध के नक्षत्र हैं, और सब राशि की संधि पर हैं. संधि पर होने की वजह से इन्हें संवेदनशील माना गया, न कि किसी दोष के कारण.


पारंपरिक उपाय

अगर परिवार में इसे लेकर चिंता है तो परंपरा में कुछ सीधे उपाय बताए गए हैं.

  • मूल शांति पूजा: जन्म के 27वें दिन, जब चंद्रमा फिर उसी नक्षत्र में लौटता है. यही सबसे प्रचलित उपाय है
  • केतु से जुड़े उपाय: गणेश जी की उपासना, क्योंकि केतु का संबंध गणपति से माना जाता है
  • दान: मंगलवार या शनिवार को कंबल, तिल या साबुत उड़द का दान
  • मंत्र: गणेश मंत्र या केतु के बीज मंत्र का नियमित जाप
  • पहले 27 दिन: परंपरा कहती है कि इस दौरान पिता बच्चे का मुख न देखें. यह प्रथा क्षेत्र के अनुसार बदलती है और सब जगह नहीं मानी जाती

इनमें से कोई भी उपाय ज़रूरी नहीं है. ये आस्था और परिवार की परंपरा पर निर्भर करते हैं.


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या मूल नक्षत्र में जन्मा बच्चा परिवार के लिए अशुभ होता है?

नहीं. यह सबसे आम भ्रांति है. शास्त्र में केवल पहले चरण को संवेदनशील कहा गया है, और उसके लिए भी शांति पूजा का विधान है. पूरे नक्षत्र को अशुभ कहना सही नहीं है.

मेरा बच्चा किस चरण में है, यह कैसे पता चले?

जन्म के समय चंद्रमा की सटीक डिग्री से. फ्री कुंडली बनाने पर नक्षत्र के साथ चरण भी दिख जाता है.

क्या मूल शांति पूजा करवाना ज़रूरी है?

परंपरा में इसे पहले चरण के लिए बताया गया है. यह आस्था का विषय है, अनिवार्य नियम नहीं.

मूल नक्षत्र में जन्मे प्रसिद्ध लोग हैं?

हां, कई. इस नक्षत्र की गहराई में उतरने की प्रवृत्ति शोध, अध्यात्म और नेतृत्व में अक्सर बड़ी सफलता देती है.


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नक्षत्र जन्म के समय चंद्रमा की स्थिति से तय होता है, इसलिए इसे अनुमान से नहीं निकाला जा सकता.

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