नाड़ी दोष और भकूट दोष

कुंडली मिलान में जब 36 गुण मिलाए जाते हैं, तो दो कूट सबसे ज़्यादा अंक रखते हैं और इसीलिए सबसे ज़्यादा चिंता भी पैदा करते हैं.

नाड़ी के 8 अंक और भकूट के 7 अंक. दोनों मिलाकर 36 में से 15, यानी पूरे मिलान का लगभग 42 प्रतिशत.


नाड़ी दोष

नाड़ी का संबंध शरीर की प्रकृति से है. 27 नक्षत्रों को तीन नाड़ियों में बांटा गया है:

नाड़ीप्रकृतिनक्षत्र (उदाहरण)
आदि (वात)वायु तत्वअश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी
मध्य (पित्त)अग्नि तत्वभरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वा फाल्गुनी
अंत्य (कफ)जल तत्वकृत्तिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा

नियम: अगर वर और वधू दोनों की नाड़ी एक ही हो, तो नाड़ी दोष माना जाता है और 8 में से 0 अंक मिलते हैं. अलग हो तो पूरे 8 अंक.

इसके पीछे का तर्क

यह उन कुछ नियमों में से है जिनका एक व्यावहारिक आधार समझ आता है.

आयुर्वेद में नाड़ी शरीर की मूल प्रकृति दर्शाती है. एक ही नाड़ी वाले दो लोगों की प्रकृति एक जैसी होगी, यानी एक ही तरह की कमज़ोरियां भी. परंपरा में इसे संतान के स्वास्थ्य से जोड़ा गया.

कुछ विद्वान इसे आधुनिक अर्थ में आनुवंशिक समानता से जोड़कर देखते हैं, हालांकि यह तुलना पूरी तरह सटीक नहीं है.

परिहार

नाड़ी दोष के कई परिहार बताए गए हैं. यानी ऐसी स्थितियां जिनमें दोष प्रभावी नहीं माना जाता:

  • दोनों का नक्षत्र एक ही हो पर चरण अलग हों
  • दोनों की राशि एक हो पर नक्षत्र अलग हो
  • नक्षत्र एक हो पर राशि अलग हो
  • नक्षत्र स्वामी आपस में मित्र हों

भकूट दोष

भकूट का संबंध दोनों की चंद्र राशियों के बीच की दूरी से है.

अगर राशियों के बीच का अंतर इनमें से कोई हो तो भकूट दोष माना जाता है:

अंतरनामकिससे जोड़ा जाता है
6 to 8षडाष्टकस्वास्थ्य और मतभेद
2 to 12द्विर्द्वादशआर्थिक स्थिति
9 to 5नवपंचमसंतान

इनमें षडाष्टक को सबसे भारी माना जाता है.

परिहार

  • दोनों की राशि का स्वामी एक ही ग्रह हो
  • दोनों के राशि स्वामी आपस में मित्र हों
  • नवपंचम में अगर ग्रह मैत्री अच्छी हो तो इसे शुभ भी माना जाता है

अब संतुलित बात

यह कहना ज़रूरी है, क्योंकि इन दो दोषों की वजह से बहुत सारे अच्छे रिश्ते टूट जाते हैं.

पहली बात: दोनों दोषों के परिहार शास्त्र में ही दिए गए हैं. यानी परंपरा ख़ुद मानती है कि ये निरपेक्ष नियम नहीं हैं. जो ज्योतिषी सिर्फ़ दोष बताए और परिहार न देखे, वह अधूरा काम कर रहा है.

दूसरी बात: 36 गुण मिलान पूरी तरह नक्षत्र और चंद्र राशि पर आधारित है. यह कुंडली का एक हिस्सा है, पूरी कुंडली नहीं. दोनों की कुंडलियों में सप्तम भाव, शुक्र, मंगल की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

तीसरी बात: दक्षिण भारत में 36 गुण नहीं, 10 पोरुथम की पद्धति चलती है, और उसमें गणना अलग होती है. एक ही जोड़े के लिए दोनों पद्धतियों में अलग नतीजा आ सकता है. इससे पता चलता है कि यह गणित नहीं, परंपरा है.

सीधी बात यह है कि गुण मिलान एक मार्गदर्शक है, फ़ैसला नहीं. विवाह की सफलता आपसी समझ, सम्मान और प्रयास पर कहीं ज़्यादा निर्भर करती है. कम गुण का मतलब सावधानी है, इनकार नहीं.

अपना मिलान ख़ुद देखने के लिए कुंडली मिलान का इस्तेमाल कर सकते हैं.


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कितने गुण मिलने चाहिए?

आमतौर पर 18 या उससे ज़्यादा को स्वीकार्य माना जाता है, 24 से ऊपर अच्छा और 32 से ऊपर उत्तम.

क्या नाड़ी दोष में विवाह नहीं हो सकता?

परिहार लागू हों तो दोष प्रभावी नहीं माना जाता. अनुभवी ज्योतिषी को पूरी कुंडली दिखाकर सलाह लेना सही रहता है.

भकूट दोष सबसे ज़्यादा किसमें भारी है?

षडाष्टक (6 to 8) को सबसे भारी माना जाता है.

उत्तर और दक्षिण भारत की पद्धति में कौन सी सही है?

दोनों अपनी अपनी परंपरा में सही हैं. अपने परिवार की परंपरा का पालन करना सबसे व्यावहारिक है. कुंडली मिलान में 36 गुण पद्धति दी गई है, और नट्चत्तिरम पोरुथम में तमिल पद्धति.


ज़रूरी बात: किसी भी दोष का पता सिर्फ़ पूरी जन्म कुंडली देखकर ही चलता है, सुनी सुनाई बातों से नहीं. अगर कोई बिना कुंडली देखे दोष बता दे और तुरंत महंगा उपाय करवाने पर ज़ोर दे, तो सावधान हो जाइए. दोष का होना अपने आप में जीवन का फ़ैसला नहीं है, यह कुंडली के कई कारकों में से एक है.

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